“जो घर बचपन में होता है ना… बड़े होने के बाद वो घर नहीं रहता, सिर्फ यादें रह जाती हैं।” जाकिर खान
कभी कभी लगता है… हम बड़े नहीं हुए, बस अपना बचपन कहीं रख कर आगे बढ़ गए।
“जो घर बचपन में होता है ना… बड़े होने के बाद वो घर नहीं रहता, सिर्फ यादें रह जाती हैं।” जाकिर खान
बचपन में घर एक जगह नहीं होता था… एक दुनिया होती थी।
जहाँ दरवाज़े बंद नहीं होते थे, बस आवाज़ें आती थीं मम्मी की डांटने की, पापा के टीवी पर निरंतर चलने वाले न्यूज की, प्रेशर कुकर की,कभी अपनी हँसी की, तो कभी अपने ही रोने की और तो और भाई बहनों के साथ झगड़ों की।
तब वक़्त रुकता नहीं था… पर भागता भी नहीं था।
शाम का मतलब होता था खेलना, ना कि deadlines।
और रात का मतलब होता था सोना, ना कि सोचना।
तब मैं वो छोटी बच्ची थी…
जो बिना वजह हंसती थी।
जो छोटी छोटी चीजों में खुश हो जाती थी।
जिसे कल की टेंशन नहीं होती थी।
फिर धीरे धीरे… वो छोटी बच्ची “बड़ी” हो गई।
अब घर भी वैसा नहीं है… और मैं भी वैसी नहीं हूँ।
दीवारें पहचान में हैं, पर उनमें वो आवाजें नहीं है।
अब ज़िम्मेदारियाँ आ गई हैं परिवार की, काम की, दुनियादारी की
और उनके बीच कहीं वो हल्का सा छोटा सा बच्चा दब गया है।
कभी कभी मन करता है…वापस जाने का।
ना किसी role में रहना हो, ना किसी expectation को पूरा करना हो।
बस वही बन जाने का जो मैं थी।
पर ज़िंदगी rewind नहीं होती।
वो बस आगे बढ़ती रहती है… बिना पीछे मुड़े सिर्फ आगे चलती हैं।
तो शायद बात वापस जाने की नहीं है।
शायद बात सिर्फ इतनी सी है…
कि हम कभी कभी अपने ही अंदर लौट आएँ।
वहाँ जहाँ सब कुछ हल्का था।
जहाँ हँसी वजह नहीं माँगती थी।
जहाँ घर एक जगह नहीं… एक एहसास होता था।
आज भी घर वही है…
दीवारें, दरवाज़े, वही कोने।
पर उनमें रहने वाले इंसान बदल गए है।
और धीरे धीरे समझ आता है घर छूटा नहीं है कहीं…
बस बचपन ने साथ रहना छोड़ दिया।
अब घर एक जगह से ज़्यादा,
एक रोशनी है… जो कभी पूरी बुझती नहीं।
कभी यादों में जल उठती है,
कभी ख़ामोशी में हल्की सी चमक जाती है।
और हम…
बस उस रोशनी तक पहुँचने के लिए,
कभी कभी आँखें बंद कर लेते हैं।
वापस उसी सुकून की तलाश में,
एक बार फिर से बचपन वाले घर की गलियों में खो जाने के लिए।
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